अजनबी
- Nupur Mannu

- Jun 26, 2020
- 1 min read
आज फुरसत से जो मिले हो तुम,
थोड़े कम अजनबी लगे हो तुम |
खुद को देखा है जब से श्कल मे तुम्हारी,
ना जाने क्यूँ? थोड़े कम गलत लगे हो तुम |
चेहरे पे झुरियाँ सी क्यूँ हैं तुम्हारी?
परछाईयाँ धुंधली सी क्यूँ है तुम्हारी?
कुछ सोंचते हो, जो माथे पे लकीरें सी हैं?
रो रहे हो, या आखें हमेशा से नम हैं तुम्हारी?
सो जाओ अब तो, कि पलकें तक थक चुकी हैं,
तनहाई में न जाने कब से जगे हो तुम |
आज फुरसत से जो मिले हो तुम,
थोड़े कम अजनबी लगे हो तुम ||

आज यूँ ठहर के तुमको देखा है,
जैसे वक्त ने आईना रखा हो सामने,
तुममें जो सुकून सा दिखा मुझे,
शायद वो मेरा ही कोई हिस्सा हो सामने।
अजनबी तो थे हम खुद से ही अब तक,
तुम मिले तो रास्ता सा मिल गया,
जो सवाल छुपे थे दिल की तहों में,
तुम्हारी खामोशी में उनका हल मिल गया।
ये लकीरें, ये थकान,
ये भी कहानी है,हर झुर्री में कोई अधूरी रवानी है,
जो आँसू दिखते हैं तुम्हारी आँखों में,
वो शायद मेरी भी साझा निशानी है।
सो जाओ अब तो, कि पलकें तक थक चुकी हैं,
तनहाई में न जाने कब से जगे हो तुम,
आज जो यूँ ठहरे हो मेरे करीब आकर,
लगता है अब…
Love your poem.